बाढ़ के बाद भी नहीं कम हुई मुश्किलें,सरकारी राहत के इंतजार में बाढ़ पीड़ित

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परसा:-प्रखंड क्षेत्र के ग्रामीण इलाको का हाल बेहाल है।बाढ़ से पीड़ित परिवार कुछ सोच नहीं पा रहे हैं। इंसान और जानवरों के बीच का फर्क मिट गया है। एक ही टेंट और झोपड़ी में मवेशी के साथ रात गुजारने को विवश है पीड़ित। परसा प्रखंड क्षेत्र के अन्याय पंचायत स्थित बभनगवा बांध,गौरीगवा हरिजन टोली इलाके में तबाही का इबारत लिख दी गई है।गांव से पानी तो निकल गया है।पर मुश्किलें बाढ़ पीड़ितों का पीछा नहीं छोड़ रहीं हैं।बाढ़ ने तबाही की ऐसी कहानी लिखी है कि जिसे देखकर हर किसी का रू खड़ा हो जा रहा है।जैसे तैसे जिंदगी गुजार रहे आपदा से मारे लोगों से सैलाब का दर्द पूछते ही उनके आंखों आंसुओं की बारिश होने लग रही है।आपदा में मिले जख्म से जिंदगी अब पहाड़ सी लगने लगी है।बाढ़ की त्रासदी ने ऐसे मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया कि मुठ्ठी भर अनाज के लिए अधिकांश पीड़ित परिवार तरसने लगे है।
राहत के लिए बेजार हैं आंखें
परसा प्रखंड क्षेत्र स्थित अन्याय पंचायत के बाढ़ पीड़ितों की मानें तो कुछ गांव में प्रशासन के राहत का कई परिवारों को अभी तक दाना नहीं मिल पाया है।जिन्हें कुछ सूखा राहत सामग्री मिला था।अब वह भी खत्म हो गए हैं।बाढ़ आपदा की सर्वाधिक मार अन्याय पंचायत स्थित बभनगवा,गौरीगवा, खिदिलपुरा,विशुनपुर,ब्रह्मपुर,अन्याय गढ़ आदि गांवों पर अधिक पड़ी है।अन्याय पंचायत के बभनगवा गांव के पीड़ित एक महीना से प्लास्टिक तान कर रह रहे जलेश्वर ठाकुर,श्यामदेवी कुअँर,रामदेई कुअँर,राजेंद्र ठाकुर,चंदेश्वर ठाकुर बताते है कि बाढ़ का पानी ने बहुत जख्म दिए बाबू, हाल मत पूछों, अपने पूर्व जन्म के गुनाहों की सजा काट रहे है, कुरेदने पर कहते है कि एक महीना बीत गया,राहत कुछ नहीं मिला है,बाढ़ के पानी में सबकुछ तबाह हो गया है,गांव से पानी तो निकल गया है,झोपड़ी क्षतिग्रस्त हो गए,केवल मालवा जमा है,कहां जाकर रहें,समझ में नहीं आ रहा है, प्रशासन की ओर से राहत के नाम पर केवल दो दिन चिवड़ा मीठा मिला था वह भी खत्म हो गया है।यह दर्द केवल बभनगवा गांव का नही है बल्कि बाढ़ के बाद अन्याय पंचायत के जहां तहां टोलों के दर्जनों परिवारों का हैं। सब समय काट रहे है घर बनाने के इंतजार में।
मिट गई दूरियां
बाढ़ की आपदा ने ऐसे हालत बना दिए हैं कि इंसान व जानवर के बीच का फर्क मिट गया है। एक ही तिरपाल के नीचे कड़ी धूप और अंधेरी रात में खाट के नीचे बकरी और बच्चे सोएं है तो वहीं टूटी फूटी खाट पर परिवार के सदस्य,जिनके लिए खाट नहीं है वह भी बकरी व अन्य जानवरों के बीच ही लेटकर रात बिता रहे हैं। ऐसी स्थिति देख राहत लेकर जा रहे लोगों की आंखें भर आ रहीं हैं।आपदा के मार को मौसम भी खूब सता रहा है, कभी तेज धूप तो कभी बारिश के बूंदों से बाढ़ पीड़ितों की जिंदगी बिलख रही है। राहत की उम्मीदों में सांसे हर पल बोझिल हो रही हैं। मौसम की तल्खि्यों से बचाव के लिए बांध पर शरण लिए पीड़ित परिवार पेड़ की छांवों में विपदा के दिन काट रहे हैं।
ग्रामीण सड़क हो गए जर्जर
आपदा ने बाढ़ पीड़ित परिवारों की जिंदगी को पांच साल पीछे ढकेल दिया है,घर आंगन के साथ विकास की कड़ी में शामिल सड़कें आदि बदहाल हो गई हैं। जिसके सजाने व संवारने के लिए बाढ़ पीडित परिवार को फिर से वही मशक्कत करनी पडेगी,जो वह गुजरे सालों में करके बनाए थे, बाढ़ पीडित के आंगन का दर्द बहुत है,और उस पर मरहम न के बराबर लगाए जा रहें हैं। फिर भी प्रशासन से राहत के इंतजार में आंखे राहों पर टकटकी लगाए हुए है।
क्या कहते है सीओ
बाढ़ पीड़ितों को हर संभव मदद पहुंचाई जा रही है। सर्वे के बाद गृह क्षति,फसल क्षति,अनुदान राशि भेजने की प्रक्रिया चल रही है।कुछ पीड़ितों को बाढ़ राहत राशि भेज दी गयी है जो बचे हुए है उन्हें भी शीघ्र पीड़ित परिवारों के खाते में आरटीजीएस के माध्यम सरकारी राशि उपलब्ध कराई जाएगी।
अखिलेश्वर चौधरी 
सीओ
परसा,सारण

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