बिहार में नीतीश के सामने छोटे भाई की भूमिका में रहने को क्यों मजबूर है बीजेपी

0
61

बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा तक ने साफ कर दिया है कि बिहार में बीजेपी नीतीश कुमार के चेहरे के सहारे चुनावी मैदान में उतरेगी. देश भर में अपने राजनीतिक प्रभाव का विस्तार करने वाली बीजेपी आखिर बिहार में क्यों आत्मनिर्भर नहीं हो पा रही है. बीजेपी की ऐसी क्या ऐसी मजबूरी है कि वह बिहार में नीतीश कुमार से सामने छोटे भाई की भूमिका में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार संजय सिंह कहते हैं कि बिहार में बीजेपी आत्मनिर्भर क्यों नहीं हो पा रही है. इसकी कई वजह हैं. बिहार में लंबे समय तक प्रयास करने के बावजूद बीजेपी राज्य के पिछड़े वर्ग में खास कर अति पिछड़ा समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर पायी है. इसी वजह से वह बिहार में नीतीश कुमार पर आश्रित है. बिहार में खास तौर पर अति पिछड़ा वर्ग के बीच नीतीश कुमार की अच्छी पैठ है और उनकी आबादी भी अधिक है.

वह कहते हैं कि बिहार में सामाजिक आंदोलनों की लंबी परंपरा रही है और खास कर लालू प्रसाद यादव के समय में राज्य के पिछड़े और दलितों ने मिल कर कई सामाजिक बंधनों को तोड़ा है तो वे उस परंपरा को आज भी फॉलो करते हैं.

नीतीश-लालू के कद का चेहरा नहीं

संजय सिंह कहते हैं कि बिहार में बीजेपी के पास कोई कद्दवर चेहरा नहीं है, जो नीतीश कुमार और लालू यादव के कद का हो. बीजेपी के पास जो भी नेता हैं वो कट्टर हिंदुत्व छवि वाले हैं. चाहे गिरिराज सिंह हो या अश्विनी चौबे वे सवर्ण समाज से आते हैं. इसलिए वे पिछड़ों और दलितों के बीच उस तरह कट्टर हिंदुत्व की भावना मजबूत नहीं कर पाए हैं. इसके अलावा बिहार में धर्म से ज्यादा जातीय राजनीति हावी रही है. इसकी काट बीजेपी अभी तक बिहार में तलाश नहीं कर सकी है.

मजबूरी में जेडीयू के साथ बीजेपी

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन कहते हैं कि बिहार में बीजेपी और नीतीश के बीच दोस्ती एक अंधे और एक लंगड़े जैसी है, जो एक दूसरे के बिना किसी काम के नाम नहीं है. बीजेपी बिहार में अपने बल पर राज नहीं कर सकती है तो नीतीश कुमार उनके लिए जरूरी हैं. वहीं, नीतीश कुमार अपने बल पर चुनाव नहीं जीत सकते हैं तो उनके लिए एक सहारे की जरूरत है. इसके बावजूद बीजेपी किसी भी सूरत में नीतीश का साथ नहीं छोड़ना चाहती है, क्योंकि उसे पता है कि अकेले मैदान में उतरकर कोई करिश्मा नहीं कर सकी है.

बीजेपी 2015 चुनाव में हश्र देख चुकी

अरविंद मोहन कहते हैं कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बीजेपी को लगा था कि वह बिहार में अकेले या कुछ छोटी पार्टियों के साथ सरकार बना सकती है, लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ जिस तरह राज्य के सभी पिछड़े और दलित एकजुट हो गये और उसे तीसरे नंबर पर ढकेल दिया, उसने बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के आत्मविश्वास को पूरी तरह से डगमगा दिया है. बीजेपी 2015 की हार से अब तक उबर नहीं पायी है. इसलिए नीतीश की शर्तें और उनका नेतृत्व स्वीकार करना उसकी मजबूरी बन गई है.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के राजनीतिक विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर अरविंद कुमार कहते हैं कि बिहार में राजनीति के मौजूदा समय में तीन सियासी ध्रुव हैं, जिनमें एक आरजेडी, दूसरी जेडीयू और तीसरी बीजेपी है. इनमें से कोई भी दो दल आपस में हाथ मिलाते हैं तो वही सत्ता पर काबिज हो जाते हैं. ऐसे में अकेले किसी में भी दम नहीं है कि वो अपने बलबूते सरकार बना सके. बिहार में तेजस्वी यादव अभी तक अपने आपको नीतीश कुमार के विकल्प के तौर पर स्थापित नहीं कर सके हैं.

बीजेपी नेता चाहते हैं नीतीश से आजादी

अरविंद कुमार कहते हैं कि बीजेपी बिहार में बिना सहयोग के कभी भी सत्ता पर काबिज नहीं हो सकती है. बीजेपी के जेडीयू का साथ खुशी का साथ नहीं है बल्कि अपनी सियासी मजबूरियां और हालात के चलते छोटे भाई की भूमिका में है. हालांकि, दूसरे राज्यों की तरह बिहार में भी बीजेपी कार्यकर्ता चाहते हैं कि यहां उनकी अपनी खुद की सरकार हो. इसके लिए समय-समय पर बीजेपी नेताओं की ओर से आवाज भी उठती रहती है.

2019 में सितंबर महीने में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कह डाला था कि जरूरत पड़ी, तो बिहार में बीजेपी अकेले चुनाव लड़ेगी. इस साल जनवरी के महीने में बीजेपी नेता और एमएलसी संजय पासवान ने भी कह दिया कि जनता एक ही चेहरे को देखते, देखते ऊब गई है. अब लोग बीजेपी के किसी पिछड़े नेता को मुख्यमंत्री पद पर देखना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि पार्टी के ज्यादातर नेताओं से यह फीडबैक मिल रहा है और उन्होंने इस राय को केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचा दिया है. हालांकि, इस बयान पर जेडीयू ने शख्त विरोध किया था.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here