अररिया के मज़दूर संगठन और प्रगतिशील समूह ने किया श्रम क़ानूनों में बदलाव का विरोध

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अररिया | 21 मई, शुक्रवार : कोरोना महामारी के चलते देश में लागू लॉकडाउन की आड़ में सरकारें मज़दूरों के हकों पर लगातार हमले किये जा रही हैं. कई राज्य सरकारों – गुजरात, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरयाणा, ओडिशा, महाराष्ट्र – ने फैक्ट्री एक्ट में बदलाव कर काम के घंटे बढ़ा कर 8 से 12 कर दिए हैं. उत्तर प्रदेश तो एक झटके में 38 श्रम कानूनों को 3 महीने के लिए ख़त्म करने की घोषणा कर चुका है. हटाये जा रहे कानूनों में न्यूनतम मज़दूरी, हड़ताल करने का अधिकार शामिल हैं. मालिक अब आसानी से मज़दूरों को काम पर से हटा सकते हैं.

एक तरफ़ तो अचानक हुए लॉकडाउन की वजह से अलग-अलग राज्यों में फसे प्रवासी मज़दूरों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. उनका काम और मज़दूरी चली गयी है, उन्हें रहने- खाने में बहुत दिक्कतें हो रही हैं. बहुत से मज़दूर तो पैदल ही अपने घरों को लौट गए, कुछ ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया तो कुछ श्रमिक ट्रेनों में अपने नंबर आने का इंतज़ार कर रहे हैं. ऐसे में उन्हें राहत पहुँचाना तो दूर सरकार उनके बचे-कुचे अधिकारों को भी ख़त्म कर रही है. लॉकडाउन के बहुत पहले से ही अर्थव्यवस्था खराब हालत में थी, और लॉकडाउन के दौरान व्यवस्था और गड़बड़ा गयी. लेकिन अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए जो रास्ता सरकारों ने चुना है, वो मज़दूरों के हकों के विरुद्ध जाता है.

22 मई को देश भर के मज़दूर संगठन ने इसका विरोध किया. अररिया में भी जन जागरण शक्ति संगठन, संयुक्त वाम मोर्चा, एन पी आर- एन आर सी- सी ए ए विरोधी संघर्ष मोर्चा और शहर के प्रबुद्ध नागरिक सड़क पर उतर कर अपना प्रतिरोध दर्ज किया कि 200 साल पहले जो लडाई मज़दूरों ने अपना खून बहा कर जीती थी उसे सरकारें बिना किसी की सलाह लिए, अपने मनमर्जी से ख़त्म नहीं कर सकतीं.

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