जानिए हीटवेव के पीछे की वजह, सबसे ज्यादा प्रभावित देश और इससे जुड़े बड़े अपडेट।
Updated at : 02 Jul 2026, 05:31 pm (IST)
Source : RASHTRIYA SAMACHAR
यूरोप इस समय दशकों की सबसे भीषण हीटवेव का सामना कर रहा है। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली, ऑस्ट्रिया, पुर्तगाल और कई अन्य देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है। लगातार बढ़ती गर्मी के बीच अब तक 1,300 से अधिक अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस स्थिति को बेहद गंभीर बताते हुए चेतावनी दी है कि यदि तापमान का यही रुख बना रहा तो मृतकों की संख्या और बढ़ सकती है।
फ्रांस सबसे ज्यादा प्रभावित
फ्रांस की सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी के अनुसार, 21 जून के बाद से हीटवेव से जुड़ी 1,000 से अधिक अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह आंकड़ा अभी अंतिम नहीं है क्योंकि निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम और घरों में हुई मौतों का पूरा डेटा आना बाकी है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए फ्रांस ने हेल्थ इमरजेंसी के उच्चतम स्तर ORSAN-3 को लागू कर दिया है ताकि अस्पतालों में अतिरिक्त संसाधन और मेडिकल स्टाफ उपलब्ध कराया जा सके।
WHO ने क्यों कहा ‘साइलेंट किलर’?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस एडनोम घेब्रेयेसस ने कहा कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। वर्तमान में करीब 15 करोड़ लोग अत्यधिक गर्मी की चपेट में हैं। WHO के मुताबिक हीट स्ट्रेस को अक्सर ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है क्योंकि यह धीरे-धीरे शरीर के हृदय, फेफड़ों और मस्तिष्क पर गंभीर असर डालता है। बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों के लिए इसका खतरा सबसे अधिक होता है।
40 डिग्री के पार पहुंचा तापमान
इस बार हीटवेव ने कई देशों में पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
फ्रांस के कुछ इलाकों में तापमान 44 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचा।
जर्मनी और ऑस्ट्रिया में पारा 40 डिग्री सेल्सियस पार कर गया।
स्पेन, पुर्तगाल और स्विट्जरलैंड में भी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी दर्ज की गई।
ब्रिटेन में रेड अलर्ट जारी किया गया।
चरमराने लगीं व्यवस्थाएं
भीषण गर्मी का असर केवल लोगों की सेहत तक सीमित नहीं है।
कई देशों में स्कूल बंद किए गए।
बिजली ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया।
जर्मनी में कुछ ट्रेन सेवाएं प्रभावित हुईं।
हंगरी के परमाणु ऊर्जा संयंत्र को उत्पादन घटाना पड़ा।
इटली की पो नदी का जलस्तर गिरने से कृषि संकट गहराने लगा है।
जलवायु परिवर्तन बना बड़ी वजह
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बार की हीटवेव सामान्य मौसमी घटना नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। वैज्ञानिकों के अनुसार, हाई प्रेशर सिस्टम और ‘हीट डोम’ जैसी परिस्थितियों ने यूरोप में गर्म हवा को लंबे समय तक रोके रखा, जिससे तापमान लगातार बढ़ता गया।
स्थिति पर दुनिया की नजर
यूरोप में बढ़ती गर्मी ने स्वास्थ्य, ऊर्जा और परिवहन व्यवस्था पर गंभीर असर डाला है। WHO ने सभी देशों से हीट एक्शन प्लान मजबूत करने, संवेदनशील आबादी की सुरक्षा बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दीर्घकालिक कदम उठाने की अपील की है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में मौसम की स्थिति पर लगातार निगरानी रखना बेहद जरूरी होगा।
Published at : 30 Jun 2026, 10:18 am (IST)
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