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होम / साहित्य / सीमेंट नहीं, गुड़ और गोंद से हो रही मरम्मत! 200 साल पुराना लखनऊ का शाही किचन आज भी दे रहा हजारों लोगों को खाना
सीमेंट नहीं, गुड़ और गोंद से हो रही मरम्मत! 200 साल पुराना लखनऊ का शाही किचन आज भी दे रहा हजारों लोगों को खाना
छोटा इमामबाड़ा के शाही किचन में अपनाई जा रही पुरानी मुगलई तकनीक, सदियों से नहीं बुझा चूल्हा

लखनऊ के छोटा इमामबाड़ा स्थित 200 साल पुराने शाही किचन की मरम्मत गुड़, गोंद और पारंपरिक तकनीक से हो रही है। जानिए इसका इतिहास और खासियत।

सीमेंट नहीं, गुड़ और गोंद से हो रही मरम्मत! 200 साल पुराना लखनऊ का शाही किचन आज भी दे रहा हजारों लोगों को खाना

Updated at : 02 Jul 2026, 05:29 pm (IST)

Source : RASHTRIYA SAMACHAR

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ अपनी तहजीब और खान-पान के लिए दुनिया भर में मशहूर है। लेकिन यहां मौजूद एक ऐसा ऐतिहासिक शाही किचन भी है, जो पिछले करीब 200 सालों से लगातार हजारों लोगों का पेट भर रहा है।

यह अनोखा किचन छोटा इमामबाड़ा परिसर के अंदर स्थित है। खास बात यह है कि इस रसोई में चूल्हा कभी ठंडा नहीं पड़ा और आज भी यहां बड़े स्तर पर लोगों के लिए खाना तैयार किया जाता है।

इस ऐतिहासिक इमारत का निर्माण साल 1837 में अवध के शासक मोहम्मद अली शाह ने करवाया था। उस समय यहां नवाबों के लिए भोजन तैयार किया जाता था, साथ ही आम जनता के लिए भी बड़े स्तर पर लंगर की व्यवस्था की जाती थी।

आज भी इस किचन की परंपरा जारी है। रमजान और मुहर्रम जैसे अवसरों पर यहां हजारों लोगों के लिए भोजन बनाया जाता है। इस रसोई का खर्च एक खास व्यवस्था के तहत चलता है, जिसकी शुरुआत नवाबों के समय में ही की गई थी।

इतिहासकारों के अनुसार, साल 1839 में मोहम्मद अली शाह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को 36 लाख रुपये दिए थे। इस रकम के ब्याज से इस किचन और इमारतों के रखरखाव का खर्च उठाया जाता था। आजादी के बाद यह जिम्मेदारी हुसैनाबाद ट्रस्ट के पास है।

समय के साथ इस ऐतिहासिक किचन की हालत खराब होने लगी थी, जिसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इसकी मरम्मत का जिम्मा उठाया। अब इस इमारत को उसके पुराने स्वरूप में वापस लाने का काम तेजी से चल रहा है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस मरम्मत में आधुनिक सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। इसके बजाय पुरानी ‘मुगलई तकनीक’ अपनाई जा रही है, जिसमें चूने, बेल के गूदे, उड़द की दाल, प्राकृतिक गोंद, गुड़ और ईंटों के चूरे का मिश्रण तैयार किया जाता है।

इसके अलावा, मरम्मत में पारंपरिक ‘लखौरी ईंटों’ का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे इस ऐतिहासिक इमारत की असली पहचान और मजबूती दोनों बरकरार रहे।