एडोल्फ हिटलर बिना चुनाव जीते जर्मनी का चांसलर कैसे बना? जानें उसकी सत्ता तक पहुंचने की पूरी कहानी और इतिहास के अहम तथ्य।
Updated at : 02 Jul 2026, 05:30 pm (IST)
Source : Rashtriya samachar
Adolf Hitler का नाम इतिहास के सबसे विवादित और खतरनाक नेताओं में लिया जाता है। उसकी कहानी सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि राजनीति, मौके और रणनीति के खतरनाक मेल की कहानी है।
हिटलर ने कभी सीधे तौर पर चुनाव जीतकर सत्ता हासिल नहीं की थी। 1930 के दशक में जर्मनी आर्थिक संकट और बेरोजगारी से जूझ रहा था। इसी माहौल में उसकी पार्टी, नाजी पार्टी, तेजी से उभरी और संसद में सबसे बड़ी पार्टी बन गई, लेकिन पूर्ण बहुमत नहीं मिला।
उस समय जर्मनी में राजनीतिक अस्थिरता थी। तत्कालीन राष्ट्रपति Paul von Hindenburg शुरुआत में हिटलर के खिलाफ थे, लेकिन राजनीतिक दबाव और सलाह के चलते 30 जनवरी 1933 को उन्होंने हिटलर को जर्मनी का चांसलर नियुक्त कर दिया।
चांसलर बनने के कुछ समय बाद जर्मन संसद (राइखस्टाग) में आग लग गई। इस घटना का फायदा उठाकर हिटलर ने आपातकालीन शक्तियां हासिल कर लीं और ‘इनेबलिंग एक्ट’ पास कराकर बिना संसद की मंजूरी के कानून बनाने का अधिकार ले लिया।
इसके बाद उसने लोकतंत्र को खत्म कर तानाशाही स्थापित कर दी। विपक्ष को दबा दिया गया, मीडिया पर नियंत्रण कर लिया गया और हिटलर खुद को सर्वोच्च नेता घोषित करने में सफल रहा।
दिलचस्प बात यह है कि 1938 में अमेरिकी पत्रिका Time Magazine ने हिटलर को “Man of the Year” चुना था। यह सम्मान उसकी अच्छाई के लिए नहीं, बल्कि दुनिया पर उसके प्रभाव के कारण दिया गया था।
हिटलर का शुरुआती जीवन भी संघर्षों से भरा था। वह एक कलाकार बनना चाहता था, लेकिन वियना की आर्ट अकादमी में दो बार असफल रहा। यही असफलता उसके जीवन का बड़ा मोड़ बनी और उसके विचारों को कठोर बनाती चली गई।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की हार और आर्थिक संकट ने उसके भीतर गुस्सा और राष्ट्रवाद को और बढ़ा दिया। उसने नाजी पार्टी जॉइन की और अपने प्रभावशाली भाषणों के जरिए लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया।
1923 में उसने विद्रोह करने की कोशिश की, जो असफल रही और उसे जेल जाना पड़ा। जेल में उसने ‘Mein Kampf’ लिखी, जिसमें उसके विचार और योजनाएं साफ झलकती हैं।
जेल से बाहर आने के बाद उसने सत्ता पाने के लिए कानूनी और राजनीतिक रास्ता अपनाया और धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत कर ली।
हिटलर की कहानी यह दिखाती है कि कैसे राजनीतिक अस्थिरता, प्रचार और रणनीति का इस्तेमाल कर कोई व्यक्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था को खत्म कर सकता है।
30 अप्रैल 1945 को, जब जर्मनी हार के करीब था, हिटलर ने बर्लिन में अपने बंकर में आत्महत्या कर ली। उसकी कहानी इतिहास का एक काला अध्याय है, जो आज भी दुनिया को चेतावनी देता है कि कट्टरता और अंधभक्ति कितनी खतरनाक हो सकती है।
Published at : 30 Apr 2026, 09:58 am (IST)
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