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होम / राष्ट्रीय / संपादकीय : महाराष्ट्र की सियासत में आज सबसे बड़ा सवाल - क्या ठाकरे नाम का जादू खत्म हो गया? ये चुनावी हार या वैचारिक हार ?
संपादकीय : महाराष्ट्र की सियासत में आज सबसे बड़ा सवाल - क्या ठाकरे नाम का जादू खत्म हो गया? ये चुनावी हार या वैचारिक हार ?
एक बार फिर महाराष्ट्र चुनाव के नतीजों से साफ हो गया है कि भाषा जोडने का काम करती है,तोडने का नहीं! भाषा संवाद का माध्यम है,हिंसा का नहीं! कोई भी राज्य किसी भी जाति की जागीर नहीं है।

हर किसी की संस्कति की अस्मिता अमर है, मराठी अस्मिता भी अमर है,थी और रहेगी..उसकी रक्षा राजनीति गुंडे नहीं कर सकते। अंत में याद रहे कंगना रनौत की लाइनें कि - आज मेरा घर टूटा है, कल तेरा घमंड टूटेगा।

संपादकीय : महाराष्ट्र की सियासत में आज सबसे बड़ा सवाल -क्या ठाकरे नाम का जादू खत्म हो गया? ये चुनावी हार या वैचारिक हार ?

Updated at : 02 Jul 2026, 05:28 pm (IST)

Source : rashtriya samachar

महाराष्ट्र ही नहीं,पूरे देश की की सियासत भी नहीं हर आम और खास दंग है कि करीब तीन दशक से मुंबई पर काबिज ठाकरे ब्रदस का जादू एक झटके में कैसे खम हो गया ? पवार की राजनीति कैसे मात खा गई ? क्या बीजेपी की रणनीति ने सत्ता का परफेक्ट खेल था? सियासत में कोई भी खेल परफेक्ट नहीं होता। दरअसल, ये हार सिर्फ चुनावी नहीं है, ये हार ठाकरे की राजनीति की वैचारिक हार है?  
एक बार फिर महाराष्ट्र चुनाव के नतीजों से साफ हो गया है कि भाषा जोडने का काम करती है,तोडने का नहीं! भाषा संवाद का माध्यम है,हिंसा का नहीं! कोई भी राज्य किसी भी जाति की जागीर नहीं है। हिंदुस्तान अखंड है, हिंदी राष्ट को जोडने वाली मां की तरह है और तमाम क्षेत्रीय भाषाएं हर किसी के लिए मां और मौसी हो सकती है, लेकिन हिंदुस्तान के किसी भी कोने में रहने के लिए भाषा अनिवार्य शर्त  नहीं है।
हर किसी की संस्कति की अस्मिता अमर है, मराठी अस्मिता भी अमर है,थी और रहेगी..उसकी रक्षा राजनीति गुंडे नहीं कर सकते। मराठी समझदार लोग भाषाई गुंडागर्दी को अच्छा नहीं मानते, वे भी कई राज्यों में प्रेम से बसे हैं, वे विकास चाहते हैं। तीन दशक से वे भी गुंडागर्दी, हफ़ता वसूली, दादागिरी से उब चुके थे। यही कारण है कि मराठी वोट बैंक भी इस चुनाव में स्प्लिट हुआ है। इसके चलते ही भाजपा के हिंदुत् का नैरेटिव चला गया। कांग्रेस–NCP ने भी अपने कोर वोटर को कन्फ्यूज किया।
असली शिवसेना का बड़ा हिस्सा शिंदे गुट के साथ चला गया। उधर, MNS का नेटवर्क सिर्फ शहरी इलाकों तक सीमित था। कह सकते हैं कि इस बार के चुनाव  विकास और भावनात्मक राजनीति के थे। ठाकरे ब्रदर्स की राजनीति प्रतीकात्मक ही रही।
विपक्षी दलों के पास रोज़गार, इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश जैसे मुद्दों का कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं था। मोदी फैक्टर और केंद्रीय नेतृत्व भी काम आया। मजबूत संगठन और बूथ मैनेजमेंट, पन्ना प्रमुख, डेटा एनालिटिक्स है। उद्धव और राज ठाकरे के पास कोई राष्ट्रीय स्तर का चेहरा नहीं है और वे तो केवल अपनी वैचारिक राजनीति से मुबई तक ही सीमित हैं। ठाकरे बंधु को क्या कभी देश में घूमते देखा हैं। मराठी + OBC + शहरी वोट का बड़ा हिस्सा BJP के साथ रहा।  ठाकरे ब्रदर्स की हार का सबसे बड़ा कारण आपसी बिखराव,पहचान का संकट और सीमित वैचारिक कुंठा रही। 
अंत में याद रहे कंगना रनौत की लाइनें कि - आज मेरा घर टूटा है, कल तेरा घमंड टूटेगा।
महाराष्ट्र की सियासत में आज सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या ठाकरे नाम का जादू खत्म हो गया?
और क्या बीजेपी ने रणनीति,संगठन और सत्ता का परफेक्ट खेल खेल दिया?