अदालत ने कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश में लिव-इन रिलेशनशिप अब एक वास्तविकता बन चुके हैं। ऐसे में केवल इस आधार पर किसी महिला को कानूनी सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसका विवाह औपचारिक रूप से पंजीकृत नहीं है।
By : Admin User | Updated at : 04 Aug 2026, 04:49 pm (IST)
महिलाओं के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि धारा 498A का संरक्षण केवल कानूनी विवाह तक सीमित नहीं माना जा सकता। यदि कोई महिला ऐसे लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही है, जिसकी प्रकृति विवाह जैसी हो, तो उसे भी प्रताड़ना की स्थिति में इस कानून का लाभ मिल सकता है।
अदालत ने कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश में लिव-इन रिलेशनशिप अब एक वास्तविकता बन चुके हैं। ऐसे में केवल इस आधार पर किसी महिला को कानूनी सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसका विवाह औपचारिक रूप से पंजीकृत नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर लिव-इन संबंध स्वतः इस श्रेणी में नहीं आएगा।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, धारा 498A का संरक्षण पाने के लिए यह आवश्यक होगा कि दोनों पक्ष बालिग हों, अपनी इच्छा से साथ रह रहे हों और उनका संबंध केवल प्रेम संबंध न होकर विवाह जैसी जिम्मेदारियों और स्थायित्व वाला हो। इसके अलावा, रिश्ते में विवाह का इरादा भी एक महत्वपूर्ण तत्व माना जाएगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला को यह साबित करना होगा कि उसका रिश्ता वास्तव में 'शादी जैसे संबंध' की श्रेणी में आता था। यदि यह स्थापित हो जाता है, तो उसे भी वही कानूनी सुरक्षा मिलेगी, जो किसी विवाहित महिला को पति या उसके परिवार द्वारा प्रताड़ित किए जाने की स्थिति में मिलती है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल धारा 498A से जुड़े मामलों के लिए लागू होगा और इसका प्रभाव कानून की अन्य धाराओं या वैधानिक अधिकारों पर स्वतः नहीं पड़ेगा। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य महिलाओं को प्रताड़ना से सुरक्षा देना है और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप उसकी व्याख्या भी समय के साथ विकसित होनी चाहिए।
Published at : 04 Aug 2026, 04:49 pm (IST)
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