इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर रोक लगाते हुए कहा है कि बिना अपमानजनक मंशा के जातिसूचक शब्द का प्रयोग अपराध नहीं है। कोर्ट ने सिद्धार्थ नगर के एक मामले में समन आदेश को रद्द कर दिया है।
Updated at : 02 Jul 2026, 05:30 pm (IST)
लखनऊ/प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (SC/ST) कानून के क्रियान्वयन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या प्रस्तुत की है। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को उसकी जाति के नाम से बुलाने के पीछे उसे अपमानित करने, डराने या नीचा दिखाने का इरादा (Mens Rea) नहीं है, तो उसे SC/ST एक्ट के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.
अदालत ने यह टिप्पणी सिद्धार्थ नगर के अमय पांडेय और तीन अन्य व्यक्तियों द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए की. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ चल रही SC/ST एक्ट की विशेष कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि बिना पर्याप्त सबूतों के ऐसे मामलों को खींचना न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग भी है.
पूरा मामला और कानूनी दलीलें
इस मामले की गहराई में जाने पर कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए, जिन्हें कोर्ट ने अपने फैसले का आधार बनाया:
• FIR में विसंगति: याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि मूल FIR में जातिसूचक अपमान का कोई उल्लेख नहीं था. जाति से संबंधित आरोप बाद में CRPC की धारा 161 के तहत दर्ज बयानों में जोड़े गए थे.
• इरादे का अभाव: कोर्ट ने पाया कि एक शादी समारोह के दौरान हुई कहासुनी में किसी को जाति से बुलाने का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि उद्देश्य जातिगत अपमान ही था.
• मेडिकल और वैज्ञानिक साक्ष्य: अभियोजन पक्ष के दावों को मेडिकल रिपोर्ट से भी समर्थन नहीं मिला, जिससे लगाए गए आरोपों की गंभीरता संदिग्ध हो गई.
• सबूतों की कमी: अदालत ने जोर देकर कहा कि SC/ST एक्ट के तहत किसी को दोषी ठहराने के लिए 'अपमान करने की मंशा' का होना अनिवार्य है, जो इस मामले में मौजूद नहीं थी.
क्या रद्द हुआ और क्या जारी रहेगा?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में न्याय और कानून के बीच एक स्पष्ट संतुलन बनाया है:
1. SC/ST एक्ट रद्द: अदालत ने विशेष अदालत द्वारा जारी किए गए उस समन आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है जो SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(Da) के तहत जारी किया गया था.
2. आपराधिक मुकदमा जारी: कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि भले ही जातिगत भेदभाव का मामला न बनता हो, लेकिन मारपीट और गाली-गलौज (IPC की धारा 147, 323 और 504) के तहत आरोपियों पर मुकदमा कानून के अनुसार चलता रहेगा.
फैसले का बड़ा असर
यह निर्णय उन मामलों के लिए एक बड़ी नजीर (Precedent) बनेगा जहाँ आपसी रंजिश या विवादों में बिना किसी आधार के SC/ST एक्ट की धाराओं का इस्तेमाल किया जाता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून का उद्देश्य दलित और शोषित समाज की रक्षा करना है, न कि इसे बिना किसी ठोस इरादे के प्रतिशोध का हथियार बनाना.
Published at : 01 May 2026, 06:11 am (IST)
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