श्रद्धा कपूर की फिल्म ‘ईथा’ में दिखेगी तमाशा सम्राज्ञी विठाबाई नारायणगांवकर की कहानी। जानिए कौन थीं विठाबाई, 9 महीने की गर्भावस्था में मंच के पीछे बच्चे को जन्म देने से लेकर महाराष्ट्र की सबसे बड़ी लावणी कलाकार बनने तक का सफर। और क्यों आज भी उनकी जिंदगी मिसाल मानी जाती है।
Updated at : 02 Jul 2026, 05:31 pm (IST)
Source : प्रिया पाण्डेय / RASHTRIYA SAMACHAR
बॉलीवुड अभिनेत्री श्रद्धा कपूर अपनी आगामी बायोपिक फिल्म ‘ईथा’ को लेकर लगातार चर्चा में हैं। फिल्म का टीज़र सामने आते ही सोशल मीडिया पर एक सवाल तेजी से वायरल होने लगा— आखिर कौन थीं विठाबाई नारायणगांवकर, जिनकी जिंदगी को बड़े पर्दे पर उतारा जा रहा है?
दरअसल, विठाबाई सिर्फ एक डांसर या गायिका नहीं थीं। वह एक ऐसी महिला थीं जिन्होंने गरीबी, जातिगत भेदभाव, सामाजिक तिरस्कार और व्यक्तिगत संघर्षों के बीच अपनी कला को जिंदा रखा और एक दिन महाराष्ट्र की लोकसंस्कृति का सबसे बड़ा चेहरा बन गईं। यही वजह है कि लोग उन्हें आज भी ‘तमाशा सम्राज्ञी’ के नाम से याद करते हैं।
मंच ही था उनका घर, कला ही थी उनकी जिंदगी
1 जुलाई 1935 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में जन्मी विठाबाई भाऊ मांग नारायणगांवकर ऐसे परिवार में पैदा हुईं, जहां कला विरासत थी, लेकिन संपत्ति नहीं। उनका परिवार तमाशा परंपरा से जुड़ा हुआ था। पिता भाऊ बापू नारायणगांवकर तमाशा मंडली चलाते थे और घर का गुजारा मंचीय प्रस्तुतियों से होता था। बचपन में ही विठाबाई ने समझ लिया था कि उनकी दुनिया किताबों से ज्यादा मंच की रोशनी में बसती है। महज 10 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार दर्शकों के सामने प्रस्तुति दी और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे-धीरे उनकी आवाज, नृत्य, चेहरे के भाव और मंच पर छा जाने की कला ने उन्हें बाकी कलाकारों से अलग पहचान दिला दी। लोग सिर्फ उनका नृत्य देखने नहीं आते थे, बल्कि उनकी प्रस्तुति को महसूस करने आते थे।
आखिर क्या है लावणी और तमाशा?
आज के युवाओं के लिए लावणी सिर्फ फिल्मों में दिखने वाला एक डांस फॉर्म हो सकता है, लेकिन महाराष्ट्र में यह एक सांस्कृतिक विरासत है। लावणी एक पारंपरिक लोकनृत्य और गायन शैली है,जहा ढोलकी की थाप पर प्रस्तुत की जाती है। इसमें प्रेम, विरह, सामाजिक मुद्दे, हास्य और जीवन के कई रंग दिखाई देते हैं। वहीं तमाशा एक संपूर्ण लोक रंगमंच है, जिसमें नृत्य, संगीत, अभिनय, व्यंग्य और लोककथाओं का संगम होता है। लेकिन इस कला से जुड़ी महिला कलाकारों को हमेशा सम्मान नहीं मिला। मंच पर तालियां मिलती थीं, लेकिन मंच से उतरते ही समाज उन्हें संदेह और तिरस्कार की नजर से देखता था। विठाबाई ने इसी दोहरी मानसिकता से लड़ते हुए अपनी पहचान बनाई।
वो घटना जिसने विठाबाई को किंवदंती बना दिया
विठाबाई की जिंदगी में एक ऐसा प्रसंग है जिसे सुनकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं। बताया जाता है कि एक बार वह नौ महीने की गर्भवती थीं और एक लाइव शो में प्रस्तुति दे रही थीं। कार्यक्रम के दौरान अचानक उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। वह मंच से उतरकर बैकस्टेज गईं। वहां किसी अस्पताल, डॉक्टर या आधुनिक सुविधा की व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने वहीं बच्चे को जन्म दिया। कहा जाता है कि गर्भनाल तक पत्थर से काटी गई। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती कुछ देर आराम करने के बाद विठाबाई फिर से स्टेज पर लौटीं और अपना अधूरा प्रदर्शन पूरा किया। आज के दौर में यह घटना अविश्वसनीय लग सकती है, लेकिन यही वह पल था जिसने उन्हें एक कलाकार से किंवदंती बना दिया। उनके लिए मंच सिर्फ रोजगार नहीं था, बल्कि जीवन था।
कला के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया
विठाबाई का सफर जितना चमकदार दिखता है, उतना आसान कभी नहीं था। एक दलित परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। तमाशा और लावणी से जुड़ी महिला कलाकारों को उस दौर में अक्सर सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता था। लेकिन विठाबाई ने हर चुनौती को अपनी ताकत बना लिया। उन्होंने महाराष्ट्र के गांव-गांव में प्रदर्शन किए। हजारों किलोमीटर की यात्राएं कीं। खुले मैदानों से लेकर बड़े मंचों तक अपनी कला का जादू बिखेरा। दर्शक उनके एक-एक भाव पर तालियां बजाते थे। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि उनका नाम ही तमाशा की पहचान बन गया।
राष्ट्रपति तक पहुंचे उनके हुनर के चर्चे
विठाबाई की प्रतिभा सिर्फ दर्शकों तक सीमित नहीं रही। उनकी कला को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला। उन्हें 1957 और 1990 में भारत के राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया। यह उस दौर में लोक कलाकारों के लिए बेहद बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। बाद में महाराष्ट्र सरकार ने उनकी स्मृति में ‘विठाबाई नारायणगांवकर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ शुरू किया, जो आज भी लोककला के क्षेत्र में योगदान देने वाले कलाकारों को दिया जाता है।
श्रद्धा कपूर के करियर का सबसे बड़ा चैलेंज

‘ईथा’ में श्रद्धा कपूर सिर्फ एक किरदार नहीं निभा रहीं, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत करने की कोशिश कर रही हैं, जिसे नई पीढ़ी शायद भूल चुकी है। टीज़र में श्रद्धा का रूपांतरण चौंकाने वाला है। भारी नौवारी साड़ी, पारंपरिक आभूषण, दमदार भाव-भंगिमाएं और लावणी की ऊर्जा उन्हें उनके अब तक के किरदारों से बिल्कुल अलग बनाती हैं। फिल्म में रणदीप हुड्डा और मोहम्मद जीशान अय्यूब भी अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे।
सिर्फ बायोपिक नहीं, लोक संस्कृति का दस्तावेज
‘ईथा’ केवल एक कलाकार की कहानी नहीं है। यह उन हजारों लोक कलाकारों की कहानी है जिन्होंने सुविधाओं के बिना, सामाजिक सम्मान के बिना और आर्थिक सुरक्षा के बिना भारतीय संस्कृति को जिंदा रखा। विठाबाई की कहानी हमें यह भी बताती है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत सिर्फ महलों, राजाओं और बड़े मंचों में नहीं बसती, बल्कि उन कलाकारों में भी बसती है जिन्होंने मिट्टी की खुशबू को अपनी कला से दुनिया तक पहुंचाया।
जब दर्शक 28 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में ‘ईथा’ देखने जाएंगे, तो शायद वे सिर्फ श्रद्धा कपूर की फिल्म नहीं देख रहे होंगे। वे उस महिला की कहानी देखेंगे जिसने दर्द को प्रदर्शन में, संघर्ष को शक्ति में और कला को अमर विरासत में बदल दिया। विठाबाई नारायणगांवकर सिर्फ लावणी की कलाकार नहीं थीं। वह एक युग थीं। और अब उनका वह सफर, जो कभी महाराष्ट्र के छोटे-छोटे मंचों तक सीमित था, बड़े पर्दे पर पूरी दुनिया देखने वाली है।
Published at : 23 Jun 2026, 07:22 am (IST)
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